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Showing posts from November, 2025

नकली बीज: सुरक्षा की ज़रूरत और किसानों की आशंकाएँ

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   ​भारत सरकार किसानों को नकली बीजों से बचाने के लिए एक नया कानून लाने पर विचार कर रही है। यह एक सराहनीय कदम है, विशेषकर यह देखते हुए कि कृषि में बीजों का योगदान कुल फसल उत्पादन का 15-20 प्रतिशत तक होता है। उच्च गुणवत्ता वाले बीजों तक पहुँच किसानों की आजीविका, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा और समग्र कृषि अर्थव्यवस्था के लिए निर्णायक है। ​नकली बीजों की समस्या मुख्य रूप से निम्न कारणों से पैदा हुई है: ​आर्थिक लालच: मुनाफा कमाने की होड़। ​कमजोर आपूर्ति श्रृंखला: बीजों के वितरण में पारदर्शिता और नियंत्रण की कमी। ​ढीले नियम: मौजूदा कानूनी ढाँचे का अपर्याप्त होना या उनका सही से लागू न हो पाना। ​किसानों में जागरूकता की कमी: सही और नकली बीज में पहचान की मुश्किल। ​निश्चित रूप से, सरकार की मंशा पर संदेह करना हमेशा उचित नहीं है, लेकिन केवल कानून ला देना ही पर्याप्त नहीं होगा। ​किसी भी नए कानून के संदर्भ में, सरकार को न केवल अपनी सुरक्षात्मक मंशा पर ध्यान देना चाहिए, बल्कि किसानों की चिंताओं को सुनना, उनका समाधान करना और उनकी आशंकाओं को खत्म करना भी बेहद जरूरी है। ​कानून बनाते समय इन बिंदुओं पर ...

परमार्थ: आंतरिक प्रकाश का शाश्वत स्रोत !

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    मानव जीवन की सार्थकता बार-बार उस आनंद में खोजी जाती है, जो व्यक्तिगत इच्छाओं की पूर्ति से प्राप्त होती है। परंतु शास्त्र और अनुभव हमें सिखाते हैं कि जब हम एक बार अध्ययन करते हैं तो आनंद प्राप्त करना सीखते हैं , तब जीवन की दिशा और दृष्टि दोनों बदल जाती हैं। इस अवस्था में, हमें परमार्थ (परोपकार) से आनंद प्राप्त हुआ लगता है। जब परमार्थ का यह भाव हमारे हृदय में जाग्रत होता है, तो हमारी निजी कंपनियों की नियुक्ति से मिलने वाली क्षणिक खुशी गौण (कम महत्वपूर्ण) हो जाती है। यह आनंद इतना गहरा और तृप्तिकारक होता है कि व्यक्तिगत इच्छाएँ स्वतः ही सीमित हो जाती हैं । यह सीमा किसी दबाव का परिणाम नहीं है, बल्कि आंतरिक संतुष्टि की पराकाष्ठा है। तुलसीदास जी ने इस भाव को सुन्दर शब्दों में व्यक्त किया है: परहित सरिस धर्म नहीं भाई, पर पीड़ा सम नहीं अधमाई। परमार्थ से प्राप्त होने वाला आनंद, भोग-विलास होने से मिलने वाले सुख से अलग है। यह परमार्थ एक स्थिर आनंद है जो कि इसमें शामिल होता है। यह शाश्वत इसलिए होता है क्योंकि यह किसी भी बाहरी वस्तु या परिस्थिति पर प्रतिबंध नहीं लगाता है। यह तो हमारी आत...

पुस्तकों का महत्व: ज्ञान की कुंजी और चिंतन का प्रकाश

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    ​पुस्तकों की महिमा का बखान शब्दों में करना सूर्य को दीपक दिखाने जैसा है। यह केवल कागज और स्याही का संग्रह नहीं, अपितु ज्ञान का अक्षय भंडार और मानव सभ्यता का मेरुदंड हैं। ये हमें केवल सूचना ही नहीं देतीं, बल्कि हमारी चेतना को विस्तृत करती हैं और हमें सोचने का तरीका सिखाती हैं। पुस्तकें हमें गहराई से किसी और के दृष्टिकोण से दुनिया देखने की क्षमता प्रदान करती हैं। वे एक खिड़की हैं, जो हमें भिन्न-भिन्न युगों, संस्कृतियों और विचारों की यात्रा कराती हैं। जब हम किसी कहानी या निबंध में डूबते हैं, तो हम अनजाने में ही 'डीप लर्निंग' की प्रक्रिया में संलग्न हो जाते हैं। यह प्रक्रिया मस्तिष्क के उन हिस्सों को सक्रिय करती है जो सहानुभूति, स्मृति और आलोचनात्मक सोच से जुड़े हैं। ​पुस्तकों का एक महत्वपूर्ण कार्य स्मृति को सहेजना है। वे इतिहास, दर्शन और विज्ञान की अमूल्य धरोहर को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाने का सशक्त माध्यम हैं। यदि पुस्तकें न होतीं, तो मानव जाति अपने अतीत के अनुभवों से वंचित रह जाती और हर बार नए सिरे से शुरुआत करने को विवश होती। वे हमारे सामूहिक विवेक को संचित करती ...

मन: अनंत सागर और रहस्यमय यात्रा !

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    ​मनुष्य का मन एक अथाह सागर की भाँति है, जिसकी गहराई को मापना असंभव है। यह एक ऐसी अनंत यात्रा है, जहाँ हर पल नए विचार, भावनाएँ और कल्पनाएँ जन्म लेती हैं और विलीन हो जाती हैं। ​चंचलता और गति: मन को एक पवन-पुत्र (वायु के पुत्र) के समान चंचल कहा गया है, जो पल भर में त्रिलोक का भ्रमण कर आता है। यह कभी अतीत की स्मृतियों के गलियारों में भटकता है, तो कभी भविष्य के स्वप्निल संसार की रचना करता है। ​विचारों का स्रोत: मन विचारों की एक अनवरत सरिता है। यह सरिता कभी शांत, निर्मल जलधारा के समान बहती है (सकारात्मक, आवश्यक विचार) तो कभी तूफानी नदी की तरह उग्र और अशांत हो जाती है (नकारात्मक, व्यर्थ के विचार)। इन विचारों के प्रवाह में ही हमारी चेतना तैरती रहती है। ​भावनाओं का उद्गम: मन सिर्फ विचारों का ही नहीं, बल्कि भावनाओं का भी उद्गम स्थल है। यह कभी प्रेम की कोमल वर्षा करता है, तो कभी क्रोध की अग्नि प्रज्वलित करता है। यह हर्ष, विषाद, भय और आशा जैसे अनगिनत रंगों से रंगा एक भाव-पटल है। ​बंधन और मुक्ति: मन ही मनुष्य के बंधन का कारण है और मन ही मुक्ति का मार्ग। जब यह इंद्रियों के वश में होता ह...

रंगमंच का एक मज़बूत स्तंभ नही रहे : राजबल्लभ प्रसाद 'विकल' को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि !

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    ​खगौल। बिहार के रंगमंच को अपनी प्रतिभा और समर्पण से सींचने वाले, 'अभिनय नाट्य संस्था' के संस्थापक और चर्चित रंगकर्मी-निर्देशक राजबल्लभ प्रसाद 'विकल' के निधन से कला जगत में गहरा शून्य छा गया है। शहर के रंगकर्मियों, साहित्यकारों और समाजसेवियों ने अत्यंत भावुक होकर उन्हें अपने श्रद्धासुमन अर्पित किए हैं। इस क्षति को केवल एक कलाकार का जाना नहीं, बल्कि बिहार की सांस्कृतिक विरासत के एक मजबूत स्तंभ का ढह जाना माना जा रहा है। ​नवाब आलम, बिहार कला पुरस्कार से सम्मानित एवं सूत्रधार के महासचिव, ने दिवंगत 'विकल' जी को नमन करते हुए कहा कि वह बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने कला के प्रचार-प्रसार के लिए विभिन्न राज्यों में नाटकों का मंचन किया, जिससे बिहार का नाम रोशन हुआ। आलम साहब ने वेदनापूर्ण स्वर में कहा, "राजबल्लभ जी बिहार रंगमंच के मजबूत आधार थे। मुझे वह दौर याद है जब खानबाग स्कूल में प्राचार्य रहते हुए भी, वह दोपहर के भोजन अवकाश में नाटक का रिहर्सल कराते थे, जिसमें कई उत्साही रंगकर्मी शामिल होते थे—मैं भी उनमें से एक था। रंगमंच में उनके योगदान को भुलाना असंभ...

बेड़िया प्रथा: परंपरा, गरीबी और पितृसत्ता की क्रूर त्रासदी !

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    बेड़िया प्रथा केवल एक सामाजिक रीति नहीं है, बल्कि यह मानवीय अधिकारों और गरिमा का खुला उल्लंघन है।  यह प्रथा कैसे महिलाओं और बच्चियों को परंपरा (Tradition) और गरीबी (Poverty) के नाम पर उनके मूल अधिकारों से वंचित कर देती है। यह एक ऐसी सामाजिक विडंबना है जो सदियों पुरानी रूढ़ियों और आर्थिक मजबूरियों के दलदल में फँसी हुई है। 1. महिला को 'आर्थिक साधन' में बदलने की विकृत प्रवृत्ति इस प्रथा का सबसे जघन्य (Heinous) पहलू यह है कि यह बेटियों को मनुष्य के रूप में नहीं, बल्कि 'आर्थिक साधन (Economic Resource)' के रूप में देखने की विकृत प्रवृत्ति को जन्म देती है। जब परिवार अपनी बेटियों की शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वतंत्रता में निवेश करने के बजाय, उन्हें आय का एक साधन मानने लगते हैं, तो यह सीधे तौर पर उनकी मानवीय पहचान का हनन है। यह विचारधारा पितृसत्तात्मक (Patriarchal) सोच को मजबूत करती है जो महिला के शरीर और श्रम पर अपना नियंत्रण स्थापित करना चाहती है। 2. सामाजिक बहिष्कार और आजीविका का संकट बेड़िया समुदाय की महिलाओं को न तो समाज में पूर्ण स्वीकृति मिलती है और न ही उन्हें स्थायी आजी...

अवसरवाद की विडंबना: 'ठगने' की मनोवृत्ति और नैतिक पतन !-प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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   यह  निहित विचार मानव स्वभाव की एक शाश्वत और कटु विडंबना को उजागर करता है। यह उस अवसरवादी चरित्र है  जो द्वैतपूर्ण नैतिकता के दलदल में धँसा हुआ है। ठगने में प्रसन्नता: एक रुग्ण सामाजिक विकृति कुछ लोग अवसर मिलते ही दूसरों को ठगने या धोखा देने का प्रयत्न करते हैं और इस कृत्य में उन्हें प्रसन्नता की अनुभूति होती है। यह मनोवृत्ति स्वार्थ और अनैतिकता की पराकाष्ठा है। यह व्यक्ति विशेष की उस रुग्ण मानसिकता का परिचायक है जहाँ क्षणिक लाभ और दूसरे की हानि में उसे एक प्रकार का निकृष्ट आत्म-संतोष प्राप्त होता है। यह व्यवहार मानवीय संबंधों के मूल आधार—विश्वास—को जड़ से हिला देता है। स्वयं ठगे जाने पर आक्रोश: नैतिक पाखंड का चरम किंतु, इस चरित्र का विरोधाभास तब सामने आता है जब वह स्वयं उसी जाल में फँस जाता है, जब वह किसी दूसरे से ठगा जाता है। यही व्यक्ति जो कल तक दूसरों को छलने में आनंद महसूस कर रहा था, अब वह भड़क उठता है। उसका आक्रोश केवल व्यक्तिगत क्षति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह इसे 'समाज के पतन' के रूप में चित्रित करने लगता है। यह प्रतिक्रिया उसके नैतिक पाखंड (Moral Hypocri...

पृथ्वी के फेफड़ों पर संकट: विरोधाभासी सम्मेलनों की निराशा

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    ​जलवायु परिवर्तन और वनों की अंधाधुंध कटाई वर्तमान वैश्विक संकटों में सबसे आगे हैं।  ​सम्मेलनों का खोखलापन और विरोधाभास एक महत्वपूर्ण सम्मेलन  जो लेम शहर में हुआ, जहाँ एक बड़ा विरोधाभास सामने आया। अमेज़न, जिसे 'पृथ्वी का फेफड़ा' कहा जाता है, उसके वनों की कटाई को रोकने का कोई साफ़ रास्ता अंतिम दस्तावेज़ में शामिल नहीं किया गया। ​यह स्थिति उस मरीज़ के समान है जिसे दिल का दौरा पड़ा हो, लेकिन चिकित्सक दवा देने के बजाय केवल "चर्चा करने" की बात कहे। जब अमेज़न का तीस फ़ीसद हिस्सा पहले ही नष्ट हो चुका है और वैश्विक तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस की ओर तेज़ी से बढ़ रहा है, तो ऐसे सम्मेलनों के निराशाजनक नतीजे यह साबित करते हैं कि हम 'चर्चा' के मायाजाल में फंसे हैं, जबकि 'कार्यवाही' की आवश्यकता है। जलवायु वैज्ञानिकों की चेतावनी कि 'समय अब नहीं बचा', इन निराशाजनक नतीजों के बावजूद अनसुनी की जा रही है। ​ विकास की अंधी दौड़: फैक्ट्री लगाने के लिए अंधाधुंध कटाई ​पर्यावरण को हो रहे इस नुकसान के पीछे एक प्रमुख कारण विकास की अंधी दौड़ है। बढ़ती हुई जनसंख्या और उपभ...

शांत कला, कोलाहल का मोल !

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   ​आज का युग उत्सवों को मात्र 'शोषण और दोहन' का अवसर बनाकर, उन्हें सामाजिक हाशिये पर धकेल रहा है। जो पर्व कभी सामुदायिक आनंद और सृजनशीलता का स्रोत थे, वे अब प्रदर्शन और अहंकार के नए आयामों में ढल गए हैं।   'अपार शोर और बाजार के विराट स्वरूप' के नीचे कहीं हमारी संवेदना, कलात्मकता और वास्तविक आनंद की धारा विलुप्त हो गई है। ​मानव मन को शांत करने की कुंजी अक्सर उसी 'धारा' में निहित होती है, जिसे हमने खो दिया है। ​कला शांति प्रदान करती है, क्योंकि यह हमें बाहरी कोलाहल से हटाकर आंतरिक संसार में ले जाती है। ​संवेदना की पुनरस्थापना: जहाँ बाज़ार का शोर वास्तविक उत्सव की भावना को कुचल देता है, वहीं कला हमें रुककर अपनी भावनाओं और दूसरों के अनुभवों को महसूस करने का मौका देती है। ​सृजन और आनंद: कलात्मकता, चाहे वह एक गीत हो, एक चित्र हो, या बस एक कहानी सुनना हो—हमें प्रदर्शन के दबाव से मुक्त करती है और सहज, निस्वार्थ आनंद की ओर ले जाती है।  जब हम किसी कलाकृति में लीन होते हैं, तो प्रदर्शन और अहंकार की भावनाएँ शिथिल पड़ जाती हैं। कला एक विनम्र संवाद है, जो हमें अपने से परे कि...

कबीर की अमर वाणी: आज के युग में भी प्रासंगिक!-प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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    ​कबीर कमाई अपनी कभी न निष्फल होय। रोपे पेड़ बबूल के आम कहाँ से होए। ​भ्रष्टाचार, लोभ और क्षणभंगुर वैभव के इस दौर में, जब मनुष्यता पर स्वार्थ का परदा पड़ गया है, संत कबीरदास की वाणी एक ऐसी मशाल है जो सदियों बाद भी हमारे अंतरंग को प्रकाशित करती है।  ​यह दोहा कर्म और परिणाम के अकाट्य सिद्धांत को दर्शाता है। जिस प्रकार गलत तरीकों, चाटुकारिता, या भ्रष्टाचार से अर्जित धन-सम्पदा क्षणिक सुख और बाहरी वैभव तो दे सकती है, लेकिन आत्मा को स्थायी सकून नहीं मिल सकता। यह एक ऐसा खोखलापन है जिसे बड़े-से-बड़ा भवन या अटारी भी नहीं भर सकती। ​आज के परिवेश को देखें तो कबीर की यह वाणी और भी अधिक समीचीन लगती है। समाज में हर ओर एक ऐसी दौड़ है जहाँ 'येन केन प्रकारेण' (जैसे भी हो) सफलता पाना ही एकमात्र लक्ष्य बन गया है।  धन, पद और झूठे अभिमान की चाह में व्यक्ति नैतिक मूल्यों को ताक पर रखकर दूसरों का शोषण और दमन करने से भी नहीं हिचकता। चंद सिक्कों की झनक में वह इतना इतराता है कि उसे अपना अंत दिखाई नहीं देता। कबीर ने इस अभिमान को सबसे बड़ा शत्रु बताया है। जो व्यक्ति गलत तरीके से कमाए हुए धन पर...

जीवन की सच्ची दौलत: खुशियों का खजाना!

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    ​हम अक्सर "अमीरी" या "संपन्नता" को बैंक बैलेंस, बड़ी गाड़ियाँ और आलीशान घरों से जोड़कर देखते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि भौतिक साधन जीवन को आरामदायक बनाते हैं, लेकिन क्या यही सच्ची दौलत है? सच्ची अमीरी का खजाना हमारे अनुभवों और रिश्तों में छिपा है। ​ मीठी नींद और खुशनुमा मौसम: कल्पना कीजिए, रात भर की हरी तथा मीठी नींद के बाद, एक खुशगवार और हवादार मौसम में आँख खुलना। यह शांति, यह ताजगी किसी भी महंगी चीज से ज़्यादा अनमोल है। ​ प्रेम और साथ: उन लोगों के साथ टहलना तथा होना, जिन्हें हम प्यार करते हैं—परिवार, दोस्त, जीवनसाथी—यह वह भावनात्मक पूंजी है जो हमें हर मुश्किल से लड़ने की ताकत देती है। अपनों का साथ जीवन की सबसे बड़ी सुरक्षा है। ​ प्रकृति का वरदान: जब हम प्रकृति को उसके दिए हुए रूप में देखते हैं—चाँदनी रात, बहती नदी, या खिलता हुआ फूल—तो यह हमारे दिल को एक ऐसी ज्यादा अमीरी से भर देता है जो कभी खत्म नहीं होती। ​वास्तविक संपन्नता का रस लबालब भरा हुआ है, लेकिन यह बाहर की चकाचौंध में नहीं, बल्कि जिंदगी के सच्चे अहसास में मिलता है। यह उस पल में है जब आप खुली हवा में...

महिलाओं का अधूरा राजनीतिक प्रतिनिधित्व !

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     ​भारतीय लोकतंत्र में महिलाएँ सक्रिय मतदाता और सियासी परिवर्तन की वाहक बन चुकी हैं, फिर भी उन्हें राजनीतिक नेतृत्व में जानबूझकर उपेक्षित रखा जाता है। यह स्थिति भारतीय राजनीति के पितृसत्तात्मक स्वरूप को दर्शाती है। ​ प्रमुख आलोचना और समस्याएँ ​चुनावी टिकट में उपेक्षा: राजनीतिक दल महिलाओं को केवल वोट बैंक के रूप में देखते हैं, उन्हें गंभीर प्रत्याशी बनाने से कतराते हैं, जिससे उनका प्रतिनिधित्व कम रहता है। ​असमान प्रतिनिधित्व: महिलाओं की बुनियादी समझ और सरोकारी भाव के बावजूद, उनका नेतृत्वकारी भूमिका से वंचित रहना लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत है। ​आरक्षण की आवश्यकता: स्थानीय निकायों में आरक्षण ने भागीदारी बढ़ाई है, लेकिन लोकसभा/विधानसभा में आरक्षण की कमी (लागू होने की देरी) के कारण उनका प्रतिनिधित्व असंतोषजनक बना हुआ है। ​ बिहार में प्रतिनिधित्व का परिदृश्य ​बिहार में भी महिला मतदाता पुरुष मतदाताओं से अधिक सक्रिय हैं, लेकिन विधायी निकायों में उनका प्रतिनिधित्व अस्थिर और कम है: ​लोकसभा (40 सीटें): ​2019 में 3 महिला सांसद थीं (7.5%)। ​2024 में यह संख्या बढ़कर 5 हुई (12.5...

राजद के 'कर्मठ सारथी' का असमय प्रस्थान: एक व्यक्तिगत क्षति !-प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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     ​संजीव जी को भावभीनी श्रद्धांजलि !😢😢 ​आज राजद परिवार ने केवल एक नेता नहीं, बल्कि एक कर्मठ, कर्तव्यनिष्ठ और संवेदनशील सारथी को खो दिया है। राजद नेता संजीव जी का असमय जाना अत्यंत पीड़ादायक और हृदय विदारक है। सांसद डॉ. मीसा भारती के करीबी रिश्तेदार और पार्टी के एक महत्वपूर्ण स्तंभ के रूप में, उनका निधन पूरे दल और उन्हें व्यक्तिगत रूप से जानने वालों के लिए एक गहरा आघात है। ​यह क्षति उन लोगों के लिए और भी मर्माहत करने वाली है, जिन्होंने संजीव जी की कर्तव्यनिष्ठा और मानवीय संवेदना को बहुत करीब से महसूस किया है। ​कर्तव्यनिष्ठा की वो अविस्मरणीय गाथा ​संजीव जी का जीवन यह दिखाता है कि एक सच्चा नेता न केवल बड़ी रैलियों में, बल्कि आम लोगों की मदद के लिए किए गए छोटे-से-छोटे प्रयासों में भी अपनी पूरी ऊर्जा लगा देता है। एक वाकया उनकी कर्तव्यनिष्ठा और मित्रता का ऐसा प्रमाण है, जो शायद ही कभी देखने को मिलता है। जब वे जीवन और मृत्यु से जूझते हुए ऑपरेशन थियेटर में प्रवेश करने वाले थे, तब भी उन्होंने मेरे एक महत्वपूर्ण कार्य को प्राथमिकता दी। उन्होंने अपनी जान की परवाह न करते हुए, बिना ...

सुनील कुमार जी को शिक्षा मंत्री बनाए जाने पर बधाई, बिहार के वित्तरहित शिक्षक-कर्मचारियों ने वेतन और सेवा शर्तों के निदान हेतु की अपील।

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​  ​बिहार विधानसभा चुनाव में गठबंधन की प्रचंड बहुमत के बाद माननीय श्री सुनील कुमार जी को बिहार का शिक्षा मंत्री बनाए जाने पर वित्तरहित शिक्षक-शिक्षकेतर कर्मचारी संयुक्त संघर्ष मोर्चा, बिहार, पटना ने हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं दी हैं। इनमें  सदस्य अध्यक्ष मंडल  जय नारायण सिंह  मधु , शम्भू कुमार सिंह, रामनरेश पाण्डेय, रामविनेश्वर सिंह सहित अन्य लोग भी थे। ​मोर्चा की तरफ से जारी किए गए पत्रों में, शिक्षा मंत्री को भेजे गए 'शुभकामना संदेश' में कहा गया है कि उनके नेतृत्व में शिक्षा विभाग के आने से वित्तरहित शिक्षक परिवार में खुशी की लहर है और आशा है कि उनके सहयोग से वित्तरहित अनुदानित शिक्षण संस्थानों की समस्याओं का निदान हो सकेगा। ​प्रमुख माँगें और चिंताएँ: ​बधाई के साथ ही, मोर्चा ने शिक्षा मंत्री श्री सुनील कुमार जी को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपते हुए राज्य के हजारों वित्तरहित शिक्षक-कर्मचारियों की गंभीर समस्याओं की ओर ध्यान आकर्षित किया है। इन समस्याओं में वेतन, पेंशन, बकाए अनुदान का भुगतान और अन्य सेवा शर्तों का निदान शामिल है। ​मोर्चा ने कहा कि वित्तरहित माध्यमिक विद्याल...

चुनौतियाँ: जीवन की अनिवार्य सच्चाई और सफलता की सीढ़ी।

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    ​यह जीवन तरह-तरह के अवरोधों और मुश्किलों से भरा पड़ा है। हमारा मन अक्सर यह चाहता है कि प्रत्येक वस्तु हमें आसानी से प्राप्त हो जाए। हम सोचते हैं कि इसके लिए न तो हमें कोई चुनौती झेलनी पड़े और न ही कोई परिश्रम करना पड़े। ​परंतु, क्या जीवन में ऐसा हो पाना संभव है? इसका उत्तर है— बिल्कुल नहीं। ​सच्चाई यह है कि चुनौतियाँ तो जन्म के साथ ही या कई बार उससे पहले ही हमारे जीवन में प्रकट हो जाती हैं। ​चुनौतियाँ अनिवार्य हैं: ठीक जैसे एक बीज को फलदार वृक्ष बनने से पहले मिट्टी के दबाव और कठोरता को झेलना पड़ता है, उसी प्रकार मनुष्य को भी अपनी क्षमताओं को पहचानने और अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए कठिनाइयों से गुज़रना पड़ता है। ​आसान राह, कमजोर मंज़िल: जिस राह पर कोई अवरोध नहीं होता, वह हमें कमज़ोर बना देती है। हम उस शक्ति और कौशल को विकसित नहीं कर पाते, जो मुश्किलों से जूझने पर प्राप्त होता है। ​परिश्रम सफलता की कीमत है: सफलता, चाहे वह छोटी हो या बड़ी, हमेशा परिश्रम की माँग करती है। यह परिश्रम ही है जो हमें हमारी मनचाही वस्तु की सही कीमत चुकाने का बोध कराता है, और उसकी प्राप्ति के बाद हमें...

भारत का भविष्य: R&D में निजी निवेश का दांव और उसकी चुनौतियां!

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    ​भारत, विश्व की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक, अपने विकास के अगले चरण के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। इस यात्रा में, शोध एवं विकास (Research & Development) को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। देश के सतत और समावेशी विकास के लिए निजी क्षेत्र का निवेश अब केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि एक आवश्यकता बन गया है। ​क्यों आवश्यक है निजी निवेश? ​सरकारी सीमाओं का विस्तार: विकासशील देशों में, सरकार के पास स्वास्थ्य, शिक्षा और रक्षा जैसे प्राथमिक क्षेत्रों पर खर्च करने की अपनी सीमाएं होती हैं। निजी पूंजी R&D को व्यापक और तीव्र गति दे सकती है। ​नवीनता और दक्षता: निजी क्षेत्र बाज़ार की मांग, वैश्विक प्रतिस्पर्धा और दक्षता-केंद्रित मानसिकता के साथ आता है, जो R&D को अधिक नवीन और व्यावहारिक (market-driven) बनाता है। ​रोजगार सृजन: उच्च-तकनीकी शोध में निवेश से गुणवत्तापूर्ण और कुशल रोज़गार के अवसर पैदा होते हैं, जिससे 'स्किल इंडिया' मिशन को बल मिलता है। ​ चुनौती: जोखिम का गणित ​हालांकि यह योजना सुनने में जितनी आकर्षक है, ज़मीनी स्तर पर इसे सफल बनाना इतना आसान नहीं है। इसकी म...

प्रिये प्राणेश्वरी, हृदयेश्वरी यदि आप हमें आदेश करें तो प्रेम का हम श्री गणेश करें ।

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    यह कर्णप्रिय गीत केवल एक निवेदन नहीं है, बल्कि उत्कृष्ट उपमाओं ('चन्द्र शीतल', 'गज गामिनी'), गहन रूपकों ('जीवन ज्वाला', 'मन उपवन', 'भाव पुष्प'), और मृदु भाषिक अभिव्यक्तियों का संगम है। कवि ने नायिका के रूप और गुण दोनों का वर्णन कर, अपने प्रेम को भौतिक आकर्षण से ऊपर उठाकर आत्मिक समर्पण के स्तर पर स्थापित किया है। यह साहित्यिक दृष्टि से प्रेम-कविता का एक उत्कृष्ट और अलंकारिक उदाहरण है।इसे किशोर कुमार ने क्या गाया है! ये चक्षु तेरे चंचल चंचल  ये कुंतल भी श्यामल श्यामल  ये अधर धरे जीवन ज्वाला  ये रूप चन्द्र शीतल शीतल ओ कामिनी ओ कामिनी प्रेम विशेष करें यदि ... हो संचित पुँयों की आशा सुन व्यथित हृदय की मृदु भाशा सर्वस्व समर्पण कर दें हम करो पूर्ण हमारी अभीलाशा गज गामिनी  गज गामिनी दूर क्लेश करें यदि ... हम भ्रमर नहीं इस यौवन के  हम याचक हैं मन उपवन के हम भाव पुष्प करते अर्पण  साकार करो सपने मन के  मन मोहिनी मन मोहिनी मन में प्रवेश करें यदि ...

भारतीय लोकतंत्र के संरक्षक: चुनाव आयोग की भूमिका और वर्तमान चुनौतियाँ !

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    विरासत ​भारत का निर्वाचन आयोग, संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत स्थापित एक सर्वोच्च स्वायत्त निकाय है, जिस पर देश में स्वतंत्र, निष्पक्ष, और पारदर्शी चुनाव कराने का दायित्व है। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) का पद न केवल एक प्रशासनिक जिम्मेदारी है, बल्कि यह पद भारतीय लोकतंत्र की अंतरात्मा का संरक्षक भी माना जाता है। इस पद की प्रतिष्ठा को टी.एन. शेषन जैसे पूर्व आयुक्तों ने अपनी निडरता और निष्पक्षता से एक नई ऊँचाई दी थी, जब उन्होंने मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट (MCC) को सख्ती से लागू कर यह सिद्ध किया था कि संविधान ECI को प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री से भी अधिक शक्ति प्रदान करता है। ​वर्तमान परिदृश्य: निष्पक्षता पर उठते सवाल ​हाल के महीनों में, निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता और कार्यशैली पर गंभीर प्रश्न उठे हैं, जो भारतीय लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए गहरी चिंता का विषय है। ​मुख्य विपक्षी नेता की चिंताएँ ​प्रमुख विपक्षी नेता और सांसद श्री राहुल गांधी द्वारा चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर उठाए गए सवाल उनकी संवैधानिक और नैतिक ज़िम्मेदारी का हिस्सा हैं। एक लोकतांत्रिक प्रणाली में, विपक्ष का...

राष्ट्र के भविष्य पर मंडराता संकट: छात्र आत्महत्या के बढ़ते आंकड़े और मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा।

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    ​राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा जारी बच्चों की आत्महत्या से जुड़े आंकड़े देश के भविष्य पर एक गंभीर संकट की ओर इशारा कर रहे हैं। वर्ष 2022 में 13,044 बच्चों ने आत्महत्या की, जो न केवल एक हृदयविदारक संख्या है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि हमारे समाज और शिक्षा प्रणाली में कहीं गहरी दरार है। इन दुखद मामलों में से 2,248 छात्र-छात्राओं द्वारा परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने पर उठाया गया कदम, इस बात का प्रमाण है कि हमने सफलता और असफलता की परिभाषा को कितना संकीर्ण और जानलेवा बना दिया है। ​आंकड़ों का गंभीर विश्लेषण ​आंकड़ों की तुलना भयावह है। NCRB के वर्ष 2001 के आंकड़ों के अनुसार, देश भर में 5,425 बच्चों ने आत्महत्या की थी। 2001 से 2022 तक की यह तुलना स्पष्ट रूप से दिखाती है कि 21 वर्षों में बच्चों की आत्महत्या की घटनाओं में लगभग 2.4 गुना की वृद्धि हुई है। यह वृद्धि दर हमें मजबूर करती है कि हम केवल आंकड़ों को न देखें, बल्कि उन कारणों की जड़ तक पहुँचें जिन्होंने हमारे किशोरों को जीवन समाप्त करने पर मजबूर किया है। ​परीक्षा का दबाव: 2,248 छात्रों की आत्महत्या सीधे तौर पर हमारी अत्यधि...

अगर मुझ से मोहब्बत है: प्रेम, त्याग और पावन समर्पण का अमर गीत!

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    फ़िल्म 'आपकी परछाइयां' (1964) का वह नगीना, जहाँ धर्मेन्द्र और सुप्रिया चौधरी की सादगी ने राजा मेहंदी अली ख़ां के शब्दों को जीवन दिया। ​राजा मेहंदी अली ख़ां द्वारा लिखे गए इस गीत की पंक्तियाँ केवल शब्द नहीं हैं, बल्कि यह पावन प्रेम (Sacred Love) के उस सर्वोच्च शिखर का वर्णन करती हैं जहाँ 'स्व' का अस्तित्व मिट जाता है और केवल 'तुम' शेष रहता है। यह गीत प्रेम के सबसे शुद्ध और निस्वार्थ रूप को परिभाषित करता है। ​गीत में पावन प्रेम के मुख्य भाव ​इस गीत में प्रेम का जो दर्शन छिपा है, वह सांसारिक आकर्षण से परे है। यह उस प्रेम की बात करता है जो देने में, त्याग में और अपने प्रिय के दुःख को हर लेने में विश्वास रखता है। ​1. संपूर्ण समर्पण और त्याग ​"अगर मुझ से मोहब्बत है मुझे सब अपने ग़म दे दो," "इन आँखों का हर इक आँसू मुझे मेरी क़सम दे दो।" ​यह पंक्ति प्रेम की कसौटी है। सच्चा प्रेम सिर्फ सुख का साथी नहीं होता, बल्कि वह अपने प्रिय के दुःख को भी अपना लेना चाहता है। यहाँ नायक (या नायिका) अपने साथी से उनके सारे आँसू और ग़म मांग रहा है—यह दर्शाता है कि ...

अलविदा 'ही-मैन': धर्मेंद्र—जुनून, संघर्ष और सादगी का वो नाम जो अमर हो गया ।

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    ​आज सिनेमा के फलक से एक ऐसा सितारा टूट गया, जिसने अपनी रौशनी से लाखों दिलों को जगमग किया था। धर्मेंद्र सिंह देओल, वह नाम जो सादगी, संघर्ष, और बेजोड़ हैंडसमनेस का पर्याय था, अब हमारे बीच नहीं है। पंजाब के एक हेडमास्टर के बेटे के लिए यह सफ़र आसान नहीं था। बचपन से ही फिल्मों का ऐसा जुनून था कि सुरैया की फिल्म 'दिल लगी' देखने के लिए वह अपने गाँव से दिल्ली तक मीलों पैदल चलकर 40 दिनों तक यह सिलसिला जारी रखते थे, और इसी जुनून ने उन्हें तय करवा दिया कि उनका करियर केवल फिल्मों में ही होगा। अपने मध्यमवर्गीय परिवार की सिनेमा के प्रति उदासीनता के बावजूद, उन्होंने अपनी राह चुनी और मुंबई की ओर कूच किया। शुरुआती दिनों में उनका संघर्ष इतना कठिन था कि रातें उन्हें बेंचों पर बितानी पड़ीं और पेट भरने के लिए उन्हें केवल चने खाकर गुजारा करना पड़ा। उनकी दृढ़ता तब सफल हुई जब उन्हें पहली फिल्म 'दिल भी तेरा हम भी तेरे' (1960) मिली, जिसके लिए उन्हें पहला मेहनताना मात्र ₹51 का चेक मिला था, लेकिन यह चेक भविष्य की विशाल सफलता की नींव था। ​धर्मेंद्र जी की शख्सियत केवल एक्शन और कॉमेडी तक सीमित नह...

'पड़ोसी धर्म' और बदलता जीवन। 'पड़ोसी धर्म': कल और आज।

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    ​एक समय था जब 'पड़ोसी' हमारे जीवन का अभिन्न अंग हुआ करता था।  'पड़ोसियों से सगा दूसरा कोई और नहीं'?"। यह भावना दर्शाती थी कि पड़ोसी केवल भौगोलिक दूरी पर रहने वाले लोग नहीं थे, बल्कि सुख-दुख और जीवन की हर खुशी-गम में साझेदार थे। ​पहले का जीवन: पड़ोस की महिलाएँ काम में हाथ बँटाती थीं, दुख-सुख में भागीदारी करती थीं, और दिवाली के पटाखों से लेकर तीज-त्योहारों तक, सब मिलकर मनाते थे। किसी के बीमार होने पर 'पड़ोसी डॉक्टर' के पास जाना भी एक मानवीय बंधन का प्रतीक था। ​आज का जीवन: आज की 'फ्लैट संस्कृति' और 'एकाकी जीवन' ने इस रिश्ते को बदल दिया है। आज हमें यही नहीं पता होता कि हमारे पड़ोस में कौन रह रहा है। मोबाइल और इंटरनेट के इस युग में, हम पड़ोस की भावना को 'तुच्छ' और अनावश्यक समझने लगे हैं। ​ सांस्कृतिक उथल-पुथल और अकेलापन रिश्ते केवल 'काम-काज' तक सीमित हो गए हैं, और शादियाँ जो पहले पंद्रह-बीस दिन तक चलती थीं, वे अब दो दिन में 'निपटा दी जाती हैं'। ​"आज का दौर सांस्कृतिक उथल-पुथल को और लेता जा रहा है और इसके लिए हम ही...

'बाड़ ही खेत को खाने लगे': बिहार में 'नशाखोरी' का नया गोरखधंधा, सूखा नशा और दवा माफिया!

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     ​- शराबबंदी के बावजूद युवा 'नशे' के जाल में, सरकार और प्रशासन पर गंभीर सवाल। ​बिहार में शराबबंदी को एक क्रांतिकारी कदम के रूप में लागू किया गया था, जिसका उद्देश्य राज्य को 'नशामुक्त' बनाना था। लेकिन, इस जनहितकारी पहल के बावजूद, आज राज्य की युवा पीढ़ी एक नए और खतरनाक नशे के गोरखधंधे की गिरफ्त में है। जहाँ दवा विक्रेता (ड्रग पेडलर्स) और अवैध कारोबारी मिलकर युवा वर्ग को 'सूखे नशे' और नशीली दवाओं की लत लगा रहे हैं। यह स्थिति शराबबंदी की सफलता पर ही नहीं, बल्कि प्रशासन की नीयत और कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है। ​ 'नया गोरखधंधा': दवा विक्रेता बने नशे के सौदागर यह स्पष्ट है कि नशीली दवाओं की आपूर्ति का एक खतरनाक चक्र चल रहा है: ​षड्यंत्र में संलिप्तता: कई दवा विक्रेता इस अवैध कारोबार में सीधे तौर पर संलिप्त हैं। ​सांठगांठ और खरीद: युवा इन्हीं विक्रेताओं से सांठगांठ करके नशे वाली दवाइयाँ खरीदते हैं। ​दस गुना मुनाफा: इन दवाओं को 10 गुना ज़्यादा दाम पर नशे के आदी लोगों को बेचा जाता है, जिससे यह एक उच्च मुनाफे वाला संगठित अपराध बन चुका है। ​निशाने पर ...

बिहार की '10 हजारी' योजना: चुनावी दान या वित्तीय बोझ?

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   भारत के  इतिहास में पहली बार सरकार द्वारा  10-10 हजार रुपये में वोट खरीदी गई है-पी के। वर्तमान में भी बिहार सरकार प्रतिदिन ₹63 करोड़ से अधिक का ब्याज चुका रही है। ​जन सुराज पार्टी के नेता प्रशांत किशोर ने बिहार के हालिया विधानसभा चुनाव परिणामों के संदर्भ में एक तीखा बयान दिया है, जिसमें उन्होंने सीधे तौर पर सत्ताधारी दल पर '10-10 हजार रुपये में वोट खरीदने' का आरोप लगाया है। उनका इशारा स्पष्ट रूप से मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना की ओर है, जिसके तहत पात्र महिलाओं के खाते में ₹10,000 की पहली किस्त भेजी गई है और बाद में ₹2 लाख तक की अतिरिक्त सहायता का वादा किया गया है। ​प्रशांत किशोर ने अगले 18-20 महीनों का प्लान बनाते हुए घोषणा की है कि उनकी पार्टी उन महिलाओं को ₹2 लाख की शेष राशि दिलाने के लिए अभियान चलाएगी, जिन्हें पहली किस्त मिल चुकी है। यह कदम एक राजनीतिक दबाव बनाने की रणनीति है, लेकिन इसका सीधा असर बिहार की नाजुक वित्तीय स्थिति पर पड़ सकता है। ​ योजना का वित्तीय बोझ: 10,000 रुपये और 2 लाख रुपये का समीकरण ​मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत, लगभग 1 करोड़ महि...

प्रोफेसर जोसेफ़ की सेवानिवृत्ति: ज्ञान की तपस्या का विराम!-प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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    ​राम लखन सिंह यादव कॉलेज में चार दशक की गौरवशाली सेवा का समापन! ​चार दशकों तक राम लखन सिंह यादव कॉलेज, अनीसाबाद, पटना के प्रांगण को अपने ज्ञान के आलोक से आलोकित करने वाले प्रोफेसर एस. एस. जोसेफ़ ने सेवाकाल से अवकाश ग्रहण कर लिया है। उनका यह विराम मात्र एक प्रोफेसर की सेवानिवृत्ति नहीं, अपितु कॉलेज के शैक्षणिक गगन में एक तेजस्वी नक्षत्र के ओझल हो जाने जैसा है। ​ 'वटवृक्ष' सा व्यक्तित्व और 'गंगा' सी वाणी ​वनस्पति विज्ञान (Botany) के इस प्रखर विद्वान का व्यक्तित्व किसी सुदृढ़ वटवृक्ष के समान था—गहराई और स्थिरता से परिपूर्ण। उनकी वाणी में धाराप्रवाह अंग्रेजी की सरिता बहती थी, जो श्रोताओं को सहज ही अपने साथ बहा ले जाती थी। वे केवल पाठ्यक्रम के ज्ञाता नहीं थे; देश-दुनिया की खबरों को वे तर्क की कसौटी पर कसते थे और उनकी व्याख्या की कला अद्भुत थी। लंबे, सुगठित कद-काठी और सदाचारी रखरखाव (Well-maintained) में रहने वाले प्रोफ़ेसर साहब जब किसी विषय पर बोलते थे, तो वह बात सीधे हृदय के द्वार तक पहुँचती थी। ​उनके जाने से आज कॉलेज का गलियारा सूना-सूना प्रतीत होता है, मानो वीणा का कोई ...

'सूत्रधार' की नाट्य कार्यशाला का भव्य समापन: सृजन और अभिव्यक्ति की नई उड़ान !

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    ​दस दिवसीय कला-साधना से छात्र-छात्राओं में हुआ नवजागरण! ​आरा: प्रकृति के स्पंदन के साथ ही, सांस्कृतिक चेतना का एक नया आलोक आरा की धरती पर उतर आया है। जहां वातावरण अभी तक सोया हुआ था, अब वह अंगड़ाई लेकर जागृत हो उठा है। इन दिनों आरा का परिवेश एक अप्रतिम ऊर्जा से ओत-प्रोत है। विगत 12 नवंबर से यहाँ का वातावरण सैकड़ों बच्चों के मधुर संगीत और जीवंत नृत्य की थाप से गुंजायमान रहा। जो बाल-हृदय कल तक कला की विविध विधाओं से अनभिज्ञ थे, आज उन्होंने अपने जीवन में आशा और अभिव्यक्ति के असंख्य रंगों को पहचानना सीख लिया है। ​यह नवजागरण बिहार, पटना की सुविख्यात नाट्य संस्था 'सूत्रधार' द्वारा आयोजित दस दिवसीय निःशुल्क प्रस्तुतिपरक नाट्य कार्यशाला का प्रतिफल है। लगभग 35-40 उत्साही छात्र-छात्राएँ प्रतिदिन यादव विद्यापीठ मध्य विद्यालय, मौलाबाग में कला की इस यज्ञशाला में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे थे। इन बच्चों के स्वर, उनकी वाणी, उनका उल्लास और उनकी आकांक्षाएँ—सब एक लय, एक ताल में समाहित हो चुके हैं। यह अद्वितीय प्रयास 'सूत्रधार' के कर्मठ और वरिष्ठ प्रशिक्षक कलाकारों की अथक साधना का परि...

न्याय की पुकार: क्या नेपाल भागेंगे अपराधी, या गया में होगा पिंडदान? 😢-प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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   ​–तस्वीर में मृतक के परिजनों को ढांढस बंधाते मा सम्राट जी और मैं। बिहार के गृहमंत्री को एक खुला पत्र: नीरज मुखिया की शहादत और त्रस्त जनता की उम्मीद – ​माननीय गृहमंत्री, श्री सम्राट चौधरी जी, ​यह पत्र सिर्फ़ एक नागरिक का आक्रोश नहीं है, बल्कि उस अंतिम पायदान के त्रस्त लोगों की आवाज़ है, जो आज भी न्याय की बाट जोह रहे हैं। ​आज मुझे वह दिन स्पष्ट रूप से याद है: 14 दिसंबर 2023। हमने एक साथ शहीद नीरज कुशवाहा मुखिया की आदमकद प्रतिमा का अनावरण किया था। उस सभा की अध्यक्षता करने का अवसर मुझे मिला था, और मैंने वहाँ की सामाजिक, राजनीतिक और भौगोलिक सच्चाइयों को बड़ी बारीकी से आपके सामने रखा था। ​ठीक एक साल पहले, 14 दिसंबर 2022 को, सुशासन के दावे वाली सरकार के बीच, फुलवारी प्रखंड के फरीदपुर गाँव में, नीरज मुखिया को उनके आवास पर, दिनदहाड़े सुबह 9 बजे, दर्जनों लोगों के बीच सामंती शक्तियों ने गोलियों से छलनी कर दिया था। ​उस दिन, मेरे उद्गार थे कि "कैसे अंतिम पायदान के लोगों को ख़शी, बकरी की तरह काटा जा रहा है।" यह उक्ति, लोगों के दिलों को झकझोर गई थी। ​आपके प्रत्युत्तर में आपने जो आशा भरी ...

'हास' की ओट में 'ह्रास': मानवीय परिपक्वता का मूल्यांकन। सार्वजनिक उपहास: एक सामाजिक व्याधि।

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    विजय का भ्रम और आत्मिक पराजय। ​"कई बार यह प्रवृत्ति समूहों में, कार्यस्थलों पर, या मित्र मंडली के सहज वातावरण में भी परिलक्षित होती है कि किसी व्यक्ति की निजी कमी को सबके सामने उजागर कर उसे हास्य का विषय बना दिया जाता है। यह कृत्य क्षणिक मनोरंजन की आपूर्ति अवश्य करता है, किंतु इसके गहरे मानवीय निहितार्थ हैं। यह एक ऐसी सामाजिक व्याधि है, जो संवेदनशीलता के मर्म को क्षीण करती है।" ​यह क्षणिक हास्य उत्पन्न करने वाला कृत्य, वास्तव में, संवेदना का अनादर है। जिस क्षण कोई व्यक्ति दूसरे की निजी त्रुटि या दुर्बलता को 'मंच' प्रदान कर उसे हंसी का पात्र बनाता है, वह अहंकार के तुष्टीकरण में संलग्न होता है। यह एक ऐसा नैतिक दरार है, जो समूह के भीतर विश्वास और सम्मान की नींव को कमजोर करता है। उपहास की यह कला, केवल उस व्यक्ति को ही नहीं आहत करती, जिसे निशाना बनाया गया है, बल्कि यह दर्शकों में भी सहानुभूति के बीजों को सुखा देती है। यह एक छिपा हुआ विषाणु है, जो सौहार्दपूर्ण संबंधों को भीतर से खोखला करता चला जाता है।  उपहास करने वाला व्यक्ति उस क्षण खुद को विजेता समझता है— मानो उसने ...

मैला ढोने की अमानवीय प्रथा: कानून बना, मगर दिल क्यों नहीं बदला?

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    ​तकनीक और सम्मानजनक रोज़गार ही एकमात्र रास्ता। ​कानून का जन्म और उसका अधूरा वादा। ​वर्ष 2013 में, केंद्र सरकार ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण कदम उठाया था। उन्होंने 'हाथ से मैला ढोने वाले कर्मचारियों के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम' लागू किया था। ​उद्देश्य: ​हाथ से मैला ढोने की प्रथा को पूरी तरह समाप्त करना। ​इस काम से जुड़े लोगों को वैकल्पिक रोज़गार, शिक्षा, और एक सम्मानजनक जीवन प्रदान करना। ​यह अधिनियम न केवल एक कानूनी दस्तावेज़ था, बल्कि मानवीय गरिमा सुनिश्चित करने का एक वादा था। मगर, जैसा कि यह लेख दुख के साथ बताता है, इस कानून के बनने के बावजूद यह अमानवीय और खतरनाक प्रथा आज भी जारी है। ​ समस्या सिर्फ प्रशासनिक नहीं, मानसिकता की है! ​हम अक्सर इस विफलता का ठीकरा केवल प्रशासनिक लापरवाही पर फोड़ देते हैं, लेकिन यह समस्या उससे कहीं ज़्यादा गहरी है। लेख में इस बात को सही ढंग से उजागर किया गया है कि इसके पीछे सामाजिक मानसिकता की गहरी जड़ें हैं। ​यह मानसिकता सफाई के काम को किसी खास वर्ग से जोड़कर देखती है, जिससे यह कार्य न केवल एक मजबूरी बन जाता है, बल्कि इससे जुड़े ...

डगर-डगर के रिश्ते: 'यार' और 'पति' की पाँच धुर ज़मीन! ! ( कहानी )- प्रो प्रसिद्ध कुमार।

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    ​ ऑटो की सीट पर एक अनसुलझा सवाल ! ​कॉलेज से लौटते वक्त, जब मैं ऑटो की सीट पर बैठा, तो पास बैठी एक महिला ने अचानक एक ऐसा सवाल दागा जिसने मेरे दिमाग़ के तार उलझा दिए। "कोई व्यक्ति दो महीने के लिए 5 धुर ज़मीन मेरे नाम पर एग्रीमेंट कर देगा, तो इसके बाद उस ज़मीन की रजिस्ट्री मेरे नाम पर हो जायेगी न!" ​पहली बार में, मैं उसकी बात का मर्म समझ ही नहीं पाया। मैंने उसका परिचय पूछा। उसने बताया कि उसका मायका और ससुराल, दोनों ही जहानाबाद के किसी गाँव में हैं। मैंने कुछ और जानने की इच्छा जताई, तो उसने एक अजीबो-ग़रीब उदाहरण से बात समझानी शुरू की। ​ऑटो चालक की ओर इशारा करते हुए वह बोली, "ये मेरे पति हैं, और आप मेरे यार हैं।" ​यह सुनते ही मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई! ​उसने अपनी बात जारी रखी, "पति से तीन बच्चे हैं, वे उनके साथ रहते हैं। और मैं आपके साथ पटना के डेरा पर काम करते हुए, आपके साथ रहने लगी, तो रिश्ते बन गए..." ​ विस्मय, क्रोध और 'पागल' का लेबल ​मैंने बीच में ही उसे सख़्ती से टोका। "तुम पागल हो क्या? तुम अपने पति के सामने मुझे क्या कही जा रही हो, और इस ऑ...

निराशा के कोहरे में छिपी आशा की किरण!

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   ​चारों तरफ निराशा की धुंध दिखती है, लेकिन इसी अंधकार के बीच कुछ रोशनी भी है। यह रोशनी कहीं दूर क्षितिज पर नहीं, बल्कि हमारे रोज़मर्रा के जीवन की छोटी-छोटी सफलताओं और बदलावों में मौजूद है। अक्सर हम बड़े-बड़े चमत्कारों या रातों-रात होने वाली क्रांतियों की उम्मीद करते हैं, जबकि असली और स्थायी परिवर्तन की नींव इन्हीं सूक्ष्म पलों में रखी जाती है। ​एक बच्चा जब पहली बार स्कूल में दाखिला पाता है, तो यह केवल एक बच्चे का प्रवेश नहीं होता; यह ज्ञान, अवसर और बेहतर भविष्य की एक पूरी पीढ़ी के लिए एक नए अध्याय की शुरुआत होती है। यह उस परिवार के सपनों का पहला कदम होता है, जिसने गरीबी और अशिक्षा की जंजीरों को तोड़ने का साहस किया है। ​जब एक लड़की जब बिना डर के साइकिल चला पाती है, तो यह सिर्फ़ यातायात का साधन नहीं होता; यह उसकी आज़ादी, आत्मविश्वास और सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ने की शक्ति का प्रतीक बन जाता है। उसके पैडल की हर घुमावट समाज को यह संदेश देती है कि महिलाएँ अब अपनी राहें खुद बनाएंगी, बिना किसी डर या रोक-टोक के। ​और जब एक किसान अपने खेत से उपज लेकर लौटता है, तो यह महज़ अनाज या सब्ज़िय...

प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY): हक़ीक़त और ख़ोखले दावों की दास्तान

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    ​सबको घर का नारा: कहाँ है "पक्का घर"? ​वर्ष 2015 में "सबको घर" के महत्त्वाकांक्षी नारे के साथ शुरू की गई प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) का मूल उद्देश्य देश के हर बेघर नागरिक को 2022 तक पक्का घर उपलब्ध कराना था। लेकिन, जैसा कि समय गवाह है, यह लक्ष्य एक कागज़ी वादा बनकर रह गया है। आज जब हम 2025 में प्रवेश कर चुके हैं, तब भी देश में बेघर लोगों की मुश्किलों में कमी आने के बजाय, वे जमीनी हकीकत पर खोखली साबित हो रही हैं। ​विस्तार पर सवाल: PMAY-अर्बन 2.0 की ज़रूरत क्यों? ​2022 की समय सीमा बीत जाने के बाद, सरकार ने लक्ष्य की प्राप्ति के बजाय, योजना का विस्तार करते हुए PMAY-अर्बन 2.0 ला दिया है। यह कदम अपने आप में योजना की असफलता को इंगित करता है। यदि योजना अपने निर्धारित समय में अपने वादों को पूरा करने में सफल होती, तो इस तरह के विस्तार की आवश्यकता ही क्यों पड़ती? यह दर्शाता है कि पहले चरण के लक्ष्य पूरे नहीं हुए हैं, और केवल योजना का नाम और समय सीमा बदलकर जनता के सामने एक नया दावा पेश किया जा रहा है। ​दावे और दस्तावेज़: बेघरों तक पहुँच का अभाव ​सरकार द्वारा अक्सर यह दावा ...